ये रिश्ते

ये रिश्ते भी पतंग की डोर की तरह होते हैं ।।
ज्यादा खींचो तो टूट जाते है, अगर ज्यादा ढील दो तो छूट जाते है ।।

फासले बीच के बड़ जाते है जब ये हमसे रूठ जाते है
और मनाते-मनाते हम इनको.. ज़िन्दगी की दौड़ में पीछे छूट जाते है ।।।

अगर ये रिश्ते मजबूत हो तो हमारा साथ कोई छोड़ता नही हैं ।।
नही तो फिर आज के जमाने में बिना मतलब के कोई किसी को पूंछता ही कहाँ हैं ।।

हम ऐसे रिश्तों को धूढते- धूढते थक जाते है ।।
फिर आखिर में हमे वही दो शख्स याद आते है ।।

वही हमारे लिए अपना जीवन न्योछावर कर जाते है ।
और आखिर में कई लोग इन्हें अपनी ज़िंदगी से दूर बृद्धाश्रम मैं छोड़ आते है ।।।

वही हमारे शुख-दुख में साथ होते है ।।
बाकी सब तो नाम के लिए हमारे पास होते है ।।

हमारी खामोसी से किसी को कुछ फर्क पड़ता नही है ।।
पर उन दोनों से वज़ह छुपाने का मन बिल्कुल भी करता नही है ।।

याद रखो.. ज़िन्दगी से बड़ी कोई सज़ा नही है ।।
बिना उनके इसमे कोई मज़ा नही है ।।

तो भाइयो इज़्ज़त करलो उस भगवान की..
सुनलो इस जनाब की..
कहीं देर ना हो जाए याद आने में..
क्योंकि फिर.. सिर्फ यादें रह जाएंगे उन माँ-बाप की ।।
    
                                       -SIDDHARTH SHUKLA

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